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थोडा हल्का - जरा हटके (हास्य वयंग्य )

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कबीर के दोहे अर्थ सहीत

पोस्टेड ओन: 3 Feb, 2012 जनरल डब्बा में

Kabirमान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।

जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।


शायरी: पार्लियामेंट के डकैतों के नाम एक शाम (Shayari)

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कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय।
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय॥

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।


READ : रहीम के दोहे अर्थ सहित हिन्दी में


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दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि।
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि॥

कबीरदास जी कहते है यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?



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कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।

आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।

एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते.

Read:” Rahim ke Dohe with meaning

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कंकड़ पत्थर जोड़ के मस्जिद लियो बनाए।

ता चढ मुल्ला बांग दे क्या बहिरा हुआ खुदा॥



Read More about Kabir ke dohe



FOR MORE VISIT: http://jack.jagranjunction.com/



यह भी बहुत मजेदार है:


Premi Premika Shayari in Hindi

HINDI STORY

Hindi Shayari

(Dohe in Hindi)


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

gurdip nijjar के द्वारा
September 27, 2014

i like dohe of kabir with meaning

jaidev das के द्वारा
July 7, 2014

कहते है एक सवाल पहेली समझो या ज्ञान, ये तुम पर है अब तुम क्या समझो, ये क्या है सवाल ज्ञान का विज्ञान कहू या विज्ञान का ज्ञान, जेसे तुम समझो वेषा कहता हु इंसान, तुमने वेद शास्त्र, परान आदि सभी कुछ छआन लिया बताता, सोचो ये पागल क्या गाता, सब कुछ छआन लिया होता तो तू भी मेरे जेसा होता, सुनकर सब हस दिये बोले देखो मुरख को लगता हे पगला गया, हम सोच कर हस दिये अरे मे फिर से खवाबो मे चला गया, तभी खवाबो की उसी याद से एक याद की आवाज आई, और में फिर से उस याद की आवाज के पिछे पिछे आ गया, बस याद की धुन ही इतनी सुरीली थी की सब कुछ देख कर भी अनदेखा करता आ गया, महसुस करता रहा तन में आने का एहसास भी मगर उसकी चाह मे वो तन में आना भी याद ना रहा, मुड कर देखा तो वही रास्ता बंद होता आ गया, बस अब क्या करू में तो यहा आकर बड़ा होता आ गया, बस एक और याद थी बाकी वो धुन जिसके पिछे यहा आ गया, जब पलटकर देखा तो धुन ने हाथ थाम लीया, लगा वही एक वो धुन है जिसके पिछे यहा आ गया, धुन से जानुगा वो रास्ता का भेद जिसके पिछे पिछे उस रास्ता से यहा आ गया, सुनकर धुन मुस्करा दी चलो ये मेरे झासे मे आ गया, और पलटकर बोली देखो चारो और मुझ बिन तुमको नही कोई बतलाएगा, में ही जानु तु किस तरह यहा आ गया, बस सुनकर धुन की धवनी उसमे ही खोकर रह गया, धुन ले चली जीव को गोदी मे उठाए के, नही कुछ कर सका वो जीव आते ही धुन की धवनी में बंद हो गया, धुन गुनगुनाती और वो सुनता रहा सुनते सुनते युग बीत गया एक, जाते जाते युग में पुछ लिया केसे आया बतला दो युग बीत गया अब एक, बोली नही कुछ खास भेद रे बस इतना तु जान रे, तुमको में ही लेकर आई तु पुत्र में माता तेरी रे, पुरूष के संग मिलकर मेंने तुम को बनाया रे, तेरे आने से पहले तेरे रहने को ये घर बनाया रे, इस घर में तुमको करने हें कुछ काम रे, फिर लोटा ले चलुगी तुमको तेरे धाम रे, सुनकर वो माँयुस हुआ कभी मुसकाया कभी रोया रे !!!!!!! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! आओ मानव जीवो बतलाता हु बदल जाता ह युग केसे रे, और आता ह अंडकार के उंदकर से नवयुग रे, जिस जिस को मालुम ह वो वो वो जान लो रे, आ ग्या समय एक याद आने का क्या क्या तुमने याद किया, वो नही काम आना रे, एक ही सवाल ह उसका क्या क्या याद ह तुमको रे, बस यही तुम फंस जाई गा रे, अब तो कर याद से तु सवाल, वरना महायाद की एक याद मे तु भी गुम चला जायगा रे, हे मानव कह रहा हु सच मगर केसे तु समझैगा रे, ये तुज को ही मालुम होगा रे, हम तो इतना जाने यही भासा को बास कर तुम समझता ह रे, फिर किस का एन्तजार ह क्या ज्यादा बोलना सत्य का साक्षी ह रे, अगर नही तो मानव जान ले कारण कोई भी हो रे, मगर युग बदलने का कारण किसी एक मानव जीव के लिये नही होता रे, ना ही वो धरती के लिया मानव और धरती तो उस कारण मे ह रे, मगर एक मानव उस कारण को जान सकता ह रे, देहसमय रहने तक ये मानव मे ताकत ह रे, मगर मानव को उसी ताकत का गुमान ह रे, उसको जीवन भर गुलाम बना कर रखता ह रे, और देह छोड़ने के बाद उसी गुमान का नशा जब टूटता ह रे, तो फिर एक बार ना सोने की कसम ही लेता ह रे, और फिर आने के लिया रोता ह रे, मगर आता उसी योनि मे ह रे, जिस की याद उस याद मे बंद ह रे, समय ना बेकार कर सोच क्या याद करना ह तुजको रे, जो तु भूल गया कोन ह क्या तु जान गया रे, अगर नही तो मरना ह क्या रे, भाग जा के जान ले जब तक तुज को मालुम ह ये स्वासा ह रे, इनसे ही कर सवाल क्या तुम हो रे, होगी तो देगी जवाब बस तु जवाब याद करना छोड़ दे रे, सब को मालुम करना ह तो मालुम करना छोड़ दे रे, जो मालुम ना हो उस को मालुम कर दूसरों को समझाना छोड़ दे रे, जो कहते ह समझा आ गया वो सब से आगे मरता ह रे, जो मरता मानव जीव को देख कर डर कर भागता ह रे, वही सवाल तलाश करता ह और मिलता भी उसको ही ह रे, नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला नही अब कोई जानन वाला क्या आप जाग गये हो मानव, अगर हा तो कैसे खुद को यकिन दिलाओगे रे, आप एक आंख से देख रहे है या दो आँखों से रे, कल्याण हो !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! पहला पन्ना या आखिरी पन्ना कहा से लिखु उस एक पल का सत्य समझ ही नही आता, क्या कुछ नही होकर चला गया उस एक पल मे, सब बिगङकर बन गया या यु कहो बनकर बिगङ गया उस एक पल मे, ना जाने कितना कुछ अपने अन्दर ही छुपा लिया उस एक पल ने, क्या कहु कैसै समझाऊ उस एक पल को, ना जाने कितने एक पल समा गये उस एक पल मे, क्या समझाऊ उस पल की कहानी क्या समझाऊ उस की दास्ता, जिसमे सब कुछ रूककर फिर शुरू हो गया, उस एक पल मे ना जाने कितने एक–एक पल के टुकङे होकर समा गये, फिर भी वो पल वही का वही रह गया, उस पल मे ना जाने कितने ही पल समाकर गुम हो गये, उस पल को खोजते-खोजते ना जाने कितने ही उस पल मे हमेशा के लिये गुम हो गये, कल भी छुपा था आज भी छुपा है, क्या है ऐसा उस पल के अंदर जिसमे न जाने कितने एक पल भी समाकर खो गए, अब तुम ही बतलाओ ए मानुष उस पल का कैसे तुम्हे राज समझाऊ, जिसमे एक-एक पल करके ना जाने कितने एक पल समा गए, मगर सवाल फिर भी वही का वही है, हम जानते उस एक-एक पल का आखिरी जवाब जहॉ तक है, उस एक पल को पकङ पाते है या जाते देख पाते है, नही ये जान पाते है क़्या हुआ उस आखिरी पल के बाद के पल मे, ना जाने कितने एक आखिरी पल खो गऐ उस आखिरी पल के बाद के पहले पल को तलाश करने मे, जँहा भी एक पल को खोज के देखा तो अगले पल के होने का अहसास दे गया, आखिरी एक पल जहॉ तक तलाश किया एक पल को, वो एक पल बढता ही चला गया, जहॉ तक भी उस पल मे उस एक पल की तलाश की, ना जाने कितना बडा लगा, मगर ना जाने कितने एक-एक पल आगे जाके देखा, उस पल के होने का एहसास तो मिला मगर वो पल फिर भी ना मिला, अब मानुष सोच रहा कैसे करू तलाश, उस एक पल के बाद के पल का रहस्य क्या है, उस एक पल के बाद का आश्चयॅ, वो पल ना मिले ना सही ये तो पता चले क्या है, उस एक आखिरी पल के बाद घटने वाले पहले पल का रहस्य, यही सोचकर दिया कदम बढाऐ, उस आखिरी पल मे फिर भी रहस्य का रहस्य ही रह गया, आखिरी पल भी मिल गया और उसके बाद का पहला पल भी मिल गया, मगर फिर तलाश अधुरी की अधुरी रह गयी, उस आखिरी एक पल और पहले एक पल के बीच वो पल फिर रह गया, कैसे करू तलाश कैसे देखु उस पल को जो दोनो के बीच आया तो सही मगर आकर चला गया, देखकर भी नही देखा वो पल आया भी और आकर चला भी गया, अगर ए मानुष तु मानता है ये सवाल है, तो दोनो के बीच ठहर जा, वही तुझे वो पल मिलेगा, जिसमे गति दिखाई देती है मगर होती नही, यही वो फैसले की घङी है जब तुझे उस पल मे फैसला करना है, जो दोनो के बीच तु खङा है यही सवाल है यही जवाब है, ना समझे वो अनाङी है, आखिरी पल मे फैसला कर ले रूककर बीच मे जाना है, फिर जो तु देखना चाहे वही पल पहला पल हो, ये फैसला तु बीच मे खङा होकर कर ले, जिस पल को तु चुन ले, वही तेरा पहला पल हो, इस घाटी मे उतरने को कितने है बेताब, मगर जान ले ए मानुष कितना आसान और कितना मुश्किल है, ये आखिरी पल और पहले पल के बीच पल का स्थान, उस पल पर पहुचने के वास्ते तुझे होना होगा दुर आखिरी और पहले पल से, दोनो की दुरी को बॉटना होगा, बॉटते ही दुरी दोनो के बीच की हो जाएगा तु दोनो के बीच, वही खङे होकर तुझे लेना है फैसला कौन सा हो तेरा अगला पहला पल, जान ले तु खङा नही होगा और खङा भी होगा, जब तु होगा खङा उन दोनो पल के बीच, होगा सभी एक-एक पल मे, मगर दोनो पलो को बॉट देना होगा तुझे बीचो-बीच, टुट जाएगा नाता तेरा सबसे कुछ पल कहो या वो एक पल जिसमे तु होगा सभी से दुर, वही जाकर लेना होगा अगले पहले पल कहा होना चाहता है तु, नही कर सकेगा जब तक तु ये सब करना है बैकार, नही कभी ये जान सकेगा दोनो एक पल के बीच का सच, और किसी भी तरह ना तु समझ पाएगा उस पल का सच, जो पहुचेगा वही जान पाएगा उस पल का सच, वो भी इतना ही वो एक आखिरी पल भी था और ये पहला पल भी है, फिर भी गुप्त रह जाएगा वो दोनो के बीच, छुट गया वो पल पकङ लो उसको, जिसे पकङकर पार उतर गये साधु सन्त और फकिर, मानुष देखता रह गया वो निकल गये बीचो-बीच बे रॅग !! ————————————————————————– भारत क्या कहु क्या है, गिनती करने यही मै बैठ गया पढने मै बैठ गया, सोच रहा था कैसे लिखु क्या-क्या लिखु क्या है भारत, सोच सोचकर थक गया कैसे लिखु भारत, निले सागर की गहराई तो माप भी लाऊ, पहले ये तो बताओ कौन यत्रं से भारत की गहराई माप कर लाऊ, धरती कहो तो क्या गुणगान सुनाऊ, हर गुणगान फिका लगता आगे इसके, ऋतु कहो तो हर ऋतु दस्तक देती भारत मे, नाम कहु तो हर नाम की दस्तक सुनती भारत मे, आदि को क्या बतलाऊ आदिमानव भी पहली बार उतरा था भारत मे, तीनो देव मिले आपस मे वो धरती का खडं भी है भारत मे, धरम कहु तो चारो धरम है मिलते भारत मे, वेंद शास्त्र और पुराण, गीता बाईबल और कुरान सब ही है इस भारत मे, सतगुरू साधु संन्त, पिर फकिर और ओलिया, ना जाने कितने भक्त शिरोमणी उतरे भारत मे, कितने ही वीरो ने लहु से सीचां वो धरती भी है भारत मे, कितने ही रागों की पहली दस्तक हुई जहॉं वो धरती भी है भारत मे, कितनी ही रागनियों की धुन जगी कितनी ही धुनों ने रूप सजाया भारत मे, कितने ही साधु सन्तो ने अलख जगाया कितने ही पिर फकिरो ने अल्हा को पाया भारत मे, कितने ही साजों की आवाज उठी, ईकतारें का तार यहा गुँजा वीणा की झन्कार उठी इस भारत मे, डमरू की धुन से लेकर शँखों का शंखनाद गुँजा इस भारत मे, पृकृति का हर रंग है खिलता इस भारत मे, साधु सन्तो ने काया भेद बताया इस भारत मे, एक-एक करके चारों युगों का भेद खुला इस भारत मे, हर युग के परमाण है मिलते पहले मानुष का भेंद है मिलता भारत मे, ज्योतिष के ज्ञान से लेकर विज्ञान के अनुमान तक सब ही रखा भारत मे, भावों के फुल यहा खिलते सिप मे मोती मिलते भारत मे, ना जाने कितने मानुष हिरे से चमके इस भारत मे, धरती रूपी चुनरी मे कितने मोती जङें इस भारत मे, कितनी ही माताओ के लाल भेंट चढे वो धरती है भारत मे, पिता के सपुत चढ गये हँसते-हँसते फाँसी वो धरती है इस भारत मे, कितनों ने बिता दिया जीवन अधेंरी कालकोठरियों मे वो धरती भारत मे, आज भी गुँज रहा बन एक सवाल भारत मे, क्या है कोई जो बता सके क्यु चढ गये वो फाँसी पे, आज भी गुँज रही उन माताओ की आहें वो धरती भी भारत मे, पुछ रही वो हर माता तुमसे बस एक सवाल वो धरती है इस भारत मे, जो चिख-चिखकर कहता खुद को भारतवासी रे, पुछ रही उनसे वो माताऐ क्या इस दिन के लिए भेँट चढा था मेरा लाल, एक सदी भी ना सभाल सके एक सपने को,क्या इसी आजादी पाने को दिया अपना लाल रे, क्या उस पल की कोई किमत नही खुन के आसुं पीकर हँसती रही वो माताऐ, अरे किस मिटटी के बन गये हो तुम ऐसी मिटटी तो ना थी भारत मे, पुछ रही वो माताऐ आज हर माँ से एक सवाल,क्या किम्मत लगाई हमारे लालो के लहुं की, जिस लहुं से वो कर गये तिलक तुम्हारे लालो को, क्या उनका लहुं माथें पे आया पसीना था जिसे पौंछकर चल दिये, वो भी किसी के लाल थे वो भी किसी के सपुत थे,वो भी किसी सुहागन के सरताज थे, वो भी बहन के भाई थे वो भी बच्चो के बाप थे, मै जानता हु नही किसी के पास जवाब रे,बस इतना तुम सुन लो मेरा जवाब रे, हर माता सुन ले आज जिनका है कोई लाल रे, क्या बीती होगी उन माताओ पर जिनके भेंट चढे वो लाल रे, तरसती रही होगी निगाहें देखने को अपने लाल को, जब-जब दिल मे उभरी होगी याद उस लाल की, एक टिस सी उभरी होगी दिल मे देखने को अपने लाल को, फिर रही होगी ढुढती निगाहें बस एक बार अपने लाल को, मगर वो भी जीते रहे देखकर तुम्हारे लाल को, क्या कोई मोल नही उन माता-पिता की आहों का, क्या कोई मोल नही उस नारी का जिसने काट दिया सिसकियों मे जीवन सारा, हाँ मै जानता हु वक्त नही अब ये जानने का, रखना तुम याद फिर अगर वो वक्त लौटा तो तुम याद करोगे, काश वो होते तो फिर से हम आजाद होते, मगर फिर ना कोई माता अपना लाल देगी, ना कोई पिता अपनी लाठी, ना बहन अपने भाई को देगी ना नारी देगी अपने सरताज को, सोचों कैसे फिर उन को जिन्दा करोगे, नही कोई रास्ता होगा बस सोचोगे और आहें भरोगे, और बस यही दिल से पुकार उठेगी काश वो होते, सभालो हिन्दवासियोँ अपने हिन्द को, रखो दिल मे सभांलकर हिन्दवासियों अपने हिन्द को !!!!!! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! क्या बात हुई तुम ही तो दुखी बता रहे थे नशा माग रहे थे अब इस से बड़ा नशा और क्या बोलु नशा तो उस का करो फिर चाहे जो करके हो मगर नशा उस महा का ही होगा फिर तो नशे का आनंद ह वरना सब बेकार ये नशे का मामूली अंश हे मे तो उस नशा का कह रहा हु जिस नशा से ये जन्म ले रहा ह “शायरी इक शरारत भरी शाम है, हर सुख़न इक छलकता हुआ जाम है, जब ये प्याले ग़ज़ल के पिए तो लगा मयक़दा तो बिना बात बदनाम है” Yr bor met kr koi mest se sayeri bheg चोरी के स्ब्दो स क्या say something our सच Kya bat h Dil khus kr dita चलो आज का सत्संग हो ज्ञ “एक हम है की खुद नशे में है, एक तुम हो की खुद नशा तुम में है।” नशा ही तो जानना ह क्या ह Nesha pyar h nesha dosti h nesha he ant h ये नशे का मामूली अंश हे मे तो उस नशा का कह रहा हु जिस नशा से ये जन्म ले रहा ह “तुम क्या जानो शराब कैसे पिलाई जाती है, खोलने से पहले बोतल हिलाई जाती है, फिर आवाज़ लगायी जाती है आ जाओ दर्दे दिलवालों, यहाँ दर्द-ऐ-दिल की दावा पिलाई जाती है” महा नशा !!! महा दशा !!! महा शक्ति !!! महा वेदी !!!! महा लक्ष्मी !!! महा कुमारी !!! महा Yr bor met kr good night Sara nesa utar diya क्या बात हुई तुम ही तो दुखी बता रहे थे नशा माग रहे थे अब इस से बड़ा नशा और क्या बोलु नशा तो उस का करो फिर चाहे जो करके हो मगर नशा उस महा का ही होगा फिर तो नशे का आनंद ह वरना सब बेकार !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! महाराज के परणाम साधु ही सत्य है साधना ही सत्य है साधने पर लक्ष्य ही सत्य है लक्ष्य साधने मे किया कर्म भी सत्य होता है अगर वो मानव कल्याण के लिए हो लक्ष्य पर पहुचने पर मानव ही अवतार कहलाता है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! मित्र और जाने अजुबे भी जिस अजुबे के सामने बोने लगते है कलिक अवतार के आने का वक्त आ गया है क्या पढें और गहनता से हर मानव विचार करे खास कर वो जरूर जो दानवों का त्रिपुर बनाने मे जाने अनजाने भी साथ दे रहा है मानव रूपी जीव का व धरती का दोहन दानवोँ के लिए बदं कर दो और दानव राजा ये आखिरी चेतावनी समझेँ अपनी त्रिलोक विजय की मिथ्या कामना को त्याग कर शिवशक्ति के शरणागत हो बुलबुले की चाहत छोड दे इसमे मानव का ही नही दानवोँ का भी विनाश तय है इस देह मात्र को अधिक आयु देने मात्र से तुम्हारा कल्याण नही होगा और ना ही एक आकाशगंगा से निकलने मे कितनी बार समझाया शब्द और ऊर्जा आकाशगंगा मे अलग हो ही नही सकते और अगर तुम आकाशगंगा से बाहर आ भी गये तो तुम्हारी भी ताकत आधी ही हो जाएगी फिर तुम्हे अपनी ताकत की ऊर्जा की पुर्ती के लिए किसी न किसी आकाशगंगा मे फिर से आना होगा मगर वो आकाशगंगा कौनसी होगी इसका चुनाव तुम कैसे करोगे क्योकि आकाशगंगाओ के बाहर तुम्हे कोई भी आकाशगंगा दिखाई ही नही देगी आकाशगंगाओ की समय चेन भी तो है ना कौन सी आकाशगंगा किस समय चेन पर होती है क्या वो एक है तो अब तुम ही सोचो तुमको इसमे से क्या चाहिए विश्वगुरू हिन्दुत्व हिन्द मे सतयुग का आगमन !!!!!!!!!!!!!! त्रिलोक विजेता विश्वगुरू शिव को नमनः महाराज के पर्णाम !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! जलती ज्योत तेरी बिन तेल बिन बाती, जागे दिन रैन और राती, आए नही जाए नही फिर भी हर जगह दरशाए, पल मे कर दे उजयारा ना समझ आए, हर मय के प्याले की हर बुंद मे तु है, जिन्दगी की आस मे तु है मौत के आगोश मे तु है, तु हर कण मे हर साँस मे तु, क्या लिखु तेरे लिए हर लिखे शब्द की स्याही मे तु, लिख तो दु मगर लिखा न जाए तु, जीवन के हर अहसास मे है तु, जिन्दगी को देखु तो मौत का अहसास है तु, मौत को देखु तो हर जगह जगमगाता उजयारा है तु, समझ तो लु मगर समझ ना आए, देख तो लु मगर देखा न जाए जान तो लु मगर जाना न जाए तु, क्या है कह तो दु मगर कहा न जाए, बस यही कहु तु नशा है जो चढाये ना चढे, चढे तो उतारा न जाए, दिखाई न दे तो दिखा भी दु समझ न आए तो समझा भी दु, पर क्या करू ऐ मुसाफिर तुमने तो कसम खाई है मर जाने की, हर रास्ता बन्द करके तु बैठा है और सोचता है दरवाजा ही नही है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! गंध रूपी सागर पाने को जल रहा, विरह ज्वाला मे मृगा जीव रे, ना ही कोई दिखता है रे, ना ही कछु समझ आये रे, भागा-भागा फिर रहा रे जीवन यु ही गवाऐ रे, बचपन खो दिया गंध को महक समझ के मानुष रे, आई जवानी और भरमाया गंध को महक समझकर गोते खाई रे, उठी विरह ज्वाला जब गंध की, फिरे डोलता पागल की तॉहि रे, नही मिली वो अरश से फरश तक फिर भी फिरे ढोलता उसके पिछे मानुष रे, गंध की विरह ज्वाला जला रही पल-पल, जब लग ढोलता रहा मन के आकाश मे, छाया रहा अधेंरा आँखो के सामने, एक तरफ दिखे रे चन्दा दुजी और सुरज आकाश मे, थक हारकर जब वो बैठा, देखा पलभर आकाश मे, क्या दिन क्या रात कहु, होता एक ही दिन आकाश मे, पलभर के लिए सब ठहर गया, ठहर गया आकाश रे, नही गति थी नही थी ध्वनि, सब ठहर गया आकाश मे, पल मे ही आया सामने एक दुजा आकाश रे, खुदी ही बनकर आया अपना सरजनहार रे, गुँज उठा शखंनाद ठहरे हुये आकाश मे, बिखर गये विणा के रंग, हो गया जीव के जीवन का आगाज रे, बह चली धार बन जीवन का आधार रे, अब तक चली थी राह अकेली, चलते-चलते अपनी ही परछाई, कब हो गयी राही ज्ञात रहा नही मानुष रे, फिर राही के संग हो चली राह, पकङ उंगली राही की राह लेके चली रे, मिलाय दिया बाकी राही से, भुल गया फिर राह को राही रे, राही खो गया दुजे राही मे, भुल गया फिर मंजिल अपनी रे, भुल गया उस राह को मानुष रे, अब खङा-खङा पुछे ये सवाल रे, सभी से पुछे खुद से ना पुछे सवाल रे, पुछ खुद से तु सवाल मिल जाएगा हर जवाब रे, देख पलटकर दिख जाएगा तुझको तेरा मुकाम रे, ना सवाल रहेगा ना जवाब रहेगा रे, जो रहेगा वो तु खुद ही रह जाएगा ! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! हर आवाज मे एक ग़ुंज है हर लय मे एक ताल है, हर सास मे एक जीवन है हर चाहत मे एक नफरत है, हर ज़िंदगी मे एक मौत है हर शब्द मे एक शब्द है, हर शब्द मे एक विचार है हर विचार मे एक ख्याल है, हर ख्याल मे एक ख्वाब् है हर ख्वाब मे एक सच और एक झुठ है, हर सच का एक झुठ है हर झुठ का एक सच है, हर जीव का एक जीवन है हर जीवन का एक अन्त है, हर अन्त का भी एक अन्त है पैदा होना जीवन की शुरूआत है या अन्त की शुरूआत है, ना देख़े तो ज़ीवन क़ी शुरूआत है देख़े तो अन्त की शुरूआत है, जानकर भी अंजान है देख़े तो क़्या देखे हर किसी से पहचान है, वक़्त वो सय्य् है पत्ता-पत्ता जिसका गुलाम है, जानते है जीवन नही है फिर भी जीवन के गुलाम है, हर जीवन का अन्त है फिर भी न जाने क़्या गुमान है, भीङ मे खुद को देख कर सबको अपना बना बैठा है, भुल गया हर किसी से अनजान है, फिर भी ये कैसा गुमान सोचता है हर सय् उसकी गुलाम है !! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! कलयुग ने जब पहला पग धरा धरती पर धुरी दुरी हो गई, दुरी फिर दिश हो गई, दिश घुम रही मुरत मे, मुरत घुम रही सुरत मे, सुरत घुम रही शिशे के दिल मे, शिशे के दिल मे एक वक़्त देखकर सो गई, आखँ खुली जब चारो ओर सुरत हो गई, सब को देखा सा लगता है, सब कुछ सुना सा लगता है, पर नही समझ अब आता है, कैसै खुद को माफ करू कैसे खुद को समझाऊ, जो दिखे जो सुनता है वही यहाँ सब हो रहा है, सुरत-सुरत मिलकर सुरॅती से सुरॅती मे खोई पङी है, सुरॅती मे बह रहा मुरती का जल, मुरती जल मे जीव घुम रहा, जीव खोए गया मुरती जल की लहरो मे, मुरती जल की लहरो मे जब-जब दुरी अवरूध हुई, तब-तब जीव भी अनुरूध होता है !! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! मानव बन जोगी कर रहा तलाश गली-गली, बनाकर मन्दिर मस्जिद और शिवालय ढुड रहा एक शिव को, एक-एक करके अनेक शिवों मे ढुड रहा एक शिव को, कहा मिलेगे कैसे मिलेगा क्यु मिलेगा यह मालुम नही किसी को, बोल-बोलकर थक गया जयदेव सभी को, नही सुनने वाला नही कोई लहने वाला, खुद ही नाम रखे खुद सज्ञां दे रहा मानव, फिर खुद ही अपने को भी भुल गया मानव, भुल गया मानव भुल गया शिव की सुरत भुल गया वो मुरत, बस मन मे ये मान लिया अब शिव नही है आ सकता क्योकि कलयुग है चल रहा, हम पापी है हमको नही मिलेगा अब महादेव, बस कर सकते उसकी पुजा-वन्दना और जप-तप और वैराग, धिरे-धिरे भुल गया जप-तप और वैराग लगा पुजने पत्थर मानकर भगवान, नही किसी को रहा यकिन पत्थर मे भी हो सकते है भगवान, बस यही यकिन कैसे तु करेगा ये फैसला तु ही करता है इंसान, इसी फैसले को तेरे बदलने लेकर मुरत का आवरण लेकर आता है भगवान, एक-एक कर कहता है सब कोई-कोई सुनता है इंसान, सुनकर भी कुछ नही मथं पाते मुरख इंसान, क्योकि मानव ने मान लिया अब कलयुग है, मानव रूप मे अब नही आ सकते भगवान, धरम गुरूओ ने चला दई कलयुग की चाल, संभल ले मानव कलयुग की भी अन्त वैला चली आई है, फिर क्यु मान रहा कलयुग की, मारेगा तुझको भी जाते-जाते ये कलयुग, अब तो रूककर सुन घोर अधेंरा जिस और तु जा रहा, रूककर सुन ले मत भाग अ मानव, ———————————————————————————– सब को मालुम हे ये ख्वाब है मगर फिर भी वो तो हर रात दिखावे के लिए सोता है वैसे वो जाग रहा है बस कुछ आराम के लिए आखों को झपका लेता है वरना तो वो जानता है ये ख्वाब है बस वो बात अलग है की मौत वाले ख्वाब पर मेरा बस नही है बाकी मुझको मालुम है ये एक ख्वाब है बस सब इसी विचार के बरमाण्डं मे सो रहे है मगर कोई भी जानता नही ह भारत वर्ल्ड गुरु बनेगा केसे ! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

SUNIL GARG के द्वारा
June 18, 2014

्ोूा दि वगीूप १३/०२/1977

Ashwini के द्वारा
May 27, 2014

LESS HELPFUL AUR KOI WEBSITE HE KYA

Anandhu ss के द्वारा
February 20, 2013

वत्सल्य पूवॆक है

GEETHU के द्वारा
February 20, 2013

कितना सरल है.

GOURI के द्वारा
February 20, 2013

सरलपूवॆक है

Vashikaran Mantra के द्वारा
January 30, 2013

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Soham Kushe के द्वारा
January 20, 2013

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Basu के द्वारा
January 14, 2013

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AANSHI के द्वारा
December 26, 2012

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    AANSHI के द्वारा
    December 26, 2012

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    Swathy के द्वारा
    January 22, 2013

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muskan naroia के द्वारा
December 6, 2012

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Diana के द्वारा
November 18, 2012

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akshita के द्वारा
October 27, 2012

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tanya के द्वारा
October 24, 2012

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tanya के द्वारा
October 24, 2012

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sagar के द्वारा
August 28, 2012

हमे बहूत पस़ंद aya

t के द्वारा
June 9, 2012

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Sagar Kumar के द्वारा
May 3, 2012

 मूझे यह दोहा अछा लगा।

    tanya के द्वारा
    October 24, 2012

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Sagar Kumar के द्वारा
May 3, 2012

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maggie के द्वारा
April 8, 2012

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    Sagar Kumar के द्वारा
    May 3, 2012

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    mohd irfan kunjathur के द्वारा
    August 7, 2012

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    tanya के द्वारा
    October 24, 2012

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